फिल्मों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है !

effects of movies on our society in hindi

समाज (society) और सिनेमा (movies) का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है। बिना समाज के सिनेमा तिलस्मी और अय्यारी उपन्यास से अधिक कुछ नहीं और बिना सिनेमा के मनोरंजन अपूर्ण रहता है। समाज-सत्य को प्रकट करना सिनेमा का दायित्व है तो समाज में अंगद के पैर की तरह अपनी जड़ जमा लेना सिनेमा का सच है। सिनेमा का समाज पर प्रभाव का प्रमाण है उसकी तीब्र इच्छा |

किशोर से लेकर प्रौढ़ तक, बालिका से लेकर कब्र में पैर लटकाई प्रौढ़ा तक, भिखारी से लेकर कर्मचारी तक साधारण राजनीति से लेकर सत्ता के परम शिखर तक बैठा समाज सिनेमा को मनोरंजन का सशक्त साधन मानता है। सिनेमा से बढ़कर सस्ता और सशक्त मनोरंजन का साधन और कहाँ?

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यह समाज पर सिनेमा का प्रभाव ही है कि लाखों लोग दूरदर्शन की अन्त्याक्षरियों में, एपीसोड के सिनेमा संबंधी प्रश्नों में, चित्रहारों में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देने को लालायित रहते हैं। यह उत्कंठा तभी सार्थक है, जब उसे सिनेमा से प्यार हो औरउस प्यार में वे पूरे डूबे हों । सिनेमा के बारे में राई-रती पता हो, उसका एकाग्रता से अध्यधन किया हो।

फिल्में समाज से कट कर जीवित नहीं रह सकती । उनकी कहानी की कथाक्घतु समाज की देन है। समाज के चलते-फिरते नर-नारी, समाज की समस्याएँ उसकी फिल्में के प्राण हैं । निर्माता फिल्‍म के लिए जिन तत्त्वों का चयन करता है, उसके बीज समाज में होते हैं। समाज पर सिनेमा का प्रभाव इतना अधिक है कि उसके बातचीत का लहजा अभिनेता-अभिनेत्रियों की संवाद-शैली पर होगा। उसका फैशन सिनेमा-स्टाइल पर होगा। उसका प्रेम-प्रदर्शन सिनेमा की नकल होगा। हिंसा और सेक्स की उन्मुक्तता में सिनेमा का प्रभाव होगा।

चोरी करने तथा डाका डालने में सिनेमा शैली का अनुसरण होगा। आज के सिनेमा ने समाज-सच को सकारात्मक पक्ष में प्रस्तुतन कर उसके विकृत-पक्ष को उजागर किया है। सामाजिक सरोकारों और समस्याओं के उपचारों से उसका दूर-दूर तक लेना-देना नहीं रहता। विजय अग्रवाल के शब्दों में, ‘उनमें समस्याओं का जो समाधान दिखाया जाता है, उसने दर्शकों के मन में समाधान की स्थिति को भ्रमित करके उसे उलझाया है।

फिल्मों का समाधान जिस ‘ सुपरमैन ‘ में निहित है, उसका अस्तित्व ही संदिग्ध है ।इस प्रकार समस्या सच होती है और उसका समाधान मिथ्या । फलस्वरूप फिल्में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाने की बजाय नकारात्मक भूमिका निभाने लगती हैं।’

फिल्म-निर्माण में कथानक, संगीत, ध्वनि, गीत, दृश्य आदि का उपयोग उसकी क्षमता की चरमसीमा तक किया जाता है। फलस्वरूप समाज की तिल-सी हिंसा फिल्मों में पहचकर ताड़ बन जाती है और पिद्दी से पिद्दी नायक भी फिल्मों में महानायक बन जाता है। इस प्रकार फिल्मों की अयथार्थवादी प्रस्तुति में सब कुछ होता है, सिवाय समाज के।

सिनेमा के कारण ही नारी के प्रति ‘ मातृवत्‌ परदारेषु ‘ की भारतीय-संस्कृति की मान्यता विलुप्त हो रही है। आज का पुरुष हर नारी में चाहे वह आयु में छोटी हो या बहुत बड़ी, ‘प्रेम-रोग’ के दर्शन करना चाहता है। इसी ‘ प्रेम-भावना’ की उपज है ‘गर्ल फ्रेन्ड’ तथा बॉय-फ्रेन्ड’ का प्रचलन | यही कारण है कि आज पति-पत्नी के सम्बन्धों में खिंचाव आ रहा है।

तलाक के केसों में न्यायालय व्यस्त हैं, त्रस्त हैं। भाई-बहिनों, देवर-भाभियों के सम्बन्धों में विकृति आ रही है। सालियों की तो बात ही छोड़िए। कहाँ तक है पतन की सीमा। सिनेमा जो न प्रभाव दिखाए, थोड़ा है| नग्नता जब कलात्मक रूप में प्रस्तुत होती है तो वह सृजनात्मकता का रूप ले लेती है। जब वह ज्यों की त्यों अभिव्यक्त होती है तो वह उससे भी अधिक अश्लील हो जाती है, जितनी वह यथार्थ रूप में थी।

अश्लीलता भी तभी आपत्तिजनक है जब उसमें आक्रामकता तथा बलात्कारी भाव हो। अर्ध नग्न उत्तेजनात्मक रूप में शरीर प्रदर्शन, कामुक हाव- भाव, वक्ष:स्थल का कृत्रिम उभार और संचालन, नृत्यों में कामुक दृश्य, समाज में ‘कैंसर के किटाणु सिद्ध हो रहे हैं । चुम्बन तक ही सीमित न रहकर आज का सिनेमा स्नान दृश्य या बलात्कार के दृश्य न दिखाए तो वह फिल्म को अपूर्ण मानता है।

चेतन मेहता की ‘ माया मेमसाहब ‘ बासु भट्टाचार्य की ‘ आस्था ‘, मीरा नायर की ‘ कामसूत्र ‘, दीपा मेहता की ‘फायर’ नंगे और अश्लील दृश्यों के कारण ही चर्चित रही है। इतना ही नहीं, आज की अस्सी प्रतिशत फिल्में सहवास दृश्यों के ‘सेक्स बम’ से ओत- प्रोत हैं।

‘अहिंसा परमो धर्म: ‘ का पुजारी भारत आज हिंसा को धर्म मानने लगा है। समाज की सहिष्णुता लोप हो रही है । धैर्य उसके कोश में है ही नहीं ।परिणामत: समाज में छोटी-छोटी बातों का हिंसात्मक रूप ले लेना, सिनेमा का ही अभिशाप है। इतना ही नहीं दंगा- फसाद, ‘फरिश्ते, तेजाब, खून का कर्ज, अग्निपथ, अपराधी, घायल, द्रोही, सड़क ‘ जैसी एक्शन फिल्मों के वीभत्स दृश्यों ने न केवल युवा पीढ़ी का जायका बदला है, अपितु समाज में अपराधिक प्रवृत्तियों को भी बढ़ावा दिया है।

दूसरी ओर सिनेमा द्वारा शराब के प्रचार ने युवा पीढ़ी में अपराधिक प्रवृत्तियों में दुस्साहसी प्रकृति को ‘ टानिक ‘ दे दिया। परिणामत: आज के युवक सिनेमा-स्टाइल पर चोरी करते हैं, डाके डालते हैं; सिनेमा-स्टाइल पर बलात्कार एवं अपराधपूर्ण कृत्य करते हैं । बात-बात में चाकू निकाल लेना तो आज फैशन बन गया है।

एक प्रख्यात पुलिस अधिकारी ने विदेशी पत्रकारों से बातचीत में कहा था कि उच्च न्यायालय में एक वकोल ने यह तर्क दिया कि ‘ अपराधी ने फिल्‍मी हिंसा से प्रभावित होकर अपने अपराध किए हैं, इसलिए उसे प्राण-दंड न दिया जाए। सिनेमा भारतीय संस्कृति को नकारता दानव है तो सभ्यता को ध्वस्त करता विध्वंसक- अस्त्र है।

भारतीय जीवन मूल्यों के हास का कारण है तो उपभोक्ता संस्कृति का जनक। श्री आनन्द कुमार का विचार है कि ‘ फिल्म समाज का दर्पण नहीं हो सकती, लेकिन फिल्म समाज से बाहर भी नहीं है। फिल्म समाज-सुधार का उपकरण नहीं है, लेकिन फिल्मों से समाज का सशक्त संवाद होता है।

फिल्में विदेशी विधा के रूप में भारतीय संस्कृति में आयोी हैं, लेकिन अब रेलगाड़ी, कारखाने और राजनीतिक दलों की तरह हमारे जीवन का जरूरी हिस्सा हैं । फिल्में साहित्य, संगीत,-राजनीति और दर्शन का विकल्प नहीं हो सकतीं, लेकिन फिल्मों की अपनी स्वायत्तता है जो समाज को महत्त्वपूर्ण स्तर पर प्रभावित करती हैं ।लेकिन अस्वीकार और चमत्कार की दो अतियों के बीच एक अनुपाती समझ का अभाव है।

यह अभाव रोटी और आत्मसम्मान के अभाव के सामानांतर ही एक और विकृति का सिलसिला बनाने लगा है ।इसलिए फिल्म और समाज के रिश्तों के भारतीय संदर्भ की ज्यादा खुली जांच-पड़ताल जरूरी होती जा रही है।

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