अर्थव्यवस्था में सुस्ती से रावण भी बच नहीं पाया पुतलों के बाजार में ‘रावण’ का कद हुआ छोटा


अर्थव्यवस्था में सुस्ती ऐसी छायी हुई है की इस सुस्ती से ‘रावण’ भी बच नहीं पाया है। विजय दशमी पर इस बार पुतलों के बाजार में ‘रावण’ का कद और छोटा हो गया है। राजधानी के पश्चिम दिल्ली के तातारपुर गांव के पुतला बनाने वाले कारीगरों को दोहरी मार का सामना करना पड़ रहा है।

कारीगरों का कहना है की ‘‘अर्थव्यवस्था सुस्त है, साथ ही पुतला बनाने वाली सामग्रियों के दाम काफी बढ़ चुके है। ऐसे में हमे पुतले का आकार काफी छोटा करना पड़ गया। यह इलाका पुतले का प्रमुख बाजार भी माना जाता है पिछले 25 साल से पुतला बना रहे महेंद्र का कहना है, ‘‘अर्थव्यवस्था में सुस्ती है।

अलग क्षेत्रों की तरह इसका असर पुतलों के कारोबारियों पर भी पड़ा है जिस वजह से हमे पुतलों का अकार कम करना पड़ गया। उनका कहना है की पुतला जितना बड़ा होगा लागत भी उतनी अधिक होगी जिस कारण दाम भी उस हिसाब से बढ़ता जाएगा। महेंद्र ने बताया की पुतला बनाने की सामग्री भी काफी महंगी हो चुकी है।

20 बांस की कौड़ी का दाम 1,200-1,300 रुपये हो गया है जो पिछले साल तक 1,000 रुपये था। पुतले को जिस तार से बाँधा जाता है वह तार भी 50 रुपये किलो के बजाय 150 रुपये में मिल रही है और रही बात कागज़ की तो उसका दाम तो लगभग दोगुना हो गया है। टैगोर गार्डन मेट्रो स्टेशन के नीचे पुतले बनाने में जुटे राजू ने बताया की 40 फुट तक के पुतले का दाम 17,000 से 20,000 रुपये तक पहुंच गया है जबकि पिछले साल तक यह पुतला 12,000-13,000 रुपये तक था।

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