लेखक द्वारा समाज को प्रेरणा

लेखक द्वारा समाज को प्रेरणा

इस आर्टिकल के द्वारा आपको ये एहसास होगा की समाज को लेखक क्या प्रेरणा देते है। आज के लेखकों की भी बात इस लेख में की गयी है।

लेखक और समाज अन्योन्यश्रित

लेखक और समाज अन्योन्यश्रित हैं। लेखक समाज से वर्ण्य-विषय लेकर अपनी शैली में ‘त्वदीयं वस्तु तुभ्यमेव समर्पये ‘ करता है, तो समाज लेखक में सामाजिकता का जागरण कर इसके अस्तित्व को बनाए रखने में सहायक बनता है । लेखक समाज का सच्चा मित्र और शुभचिन्तक है, तो समाज लेखक का पालन-पोषण तथा वर्द्धन करता है। लेखन तपस्या है, साधना है, तो समाज लेखक की तपोभूमि है, साधना-स्थली है । लेखक के बिना समाज मूक है और समाज के बिना लेखक का लेखन व्यर्थ।

लेखकों द्वारा समाज को प्रेरणा

गोस्वामी तुलसीदास ने ‘स्वान्त: सुखाय रघुनाथ गाथा’ लिखकर हिन्दू समाज के मृतप्राय: शरीर में नवीन प्राणों का संचार किया। मुंशी प्रेमचन्द ने समाज की बुराइयों की तह तक जाकर अपने साहित्य के द्वारा उनका विश्लेषण किया । महर्षि दयानन्द, विवेकानन्द, तिलक, अरविन्द आदि महापुरुषों ने अपनी साहित्यिक वाणी से समाज को आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति प्रदान की। मैथिलीशरण गुप्त, रामधारीसिंह ‘दिनकर’, सोहनलाल द्विबेदी ने राष्ट्र और समाज को चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा दी। कवि भूषण की लेखनी ने हिन्दू जनता में वीरता की भावना जागृत कर दी। यूरोप में अनुदार और धार्मिक रूढ़ियों को, पोप की प्रभुसत्ता को लेखकों ने ही उखाड़ फेंका। फ्रांस में राज्यक्रांतिं तथा
प्रजातंत्र का विकास लेखकों की ही देन है।

लेखक द्वारा समाज को प्रेरणा

यद्यपि शृंगार रस राज है, पर थृंगार के नाम पर केवल नग्न-वासनादर्शन लेखक का ओछापन है। थृंगार में भी अश्लीलता यदि नग्नावस्था में प्रकट न हो, तो सुप्त वासना कैसे पूरी हो ? साला-साली, पत्नी- पुत्री, सखा-सखी किसी को भी तो नहीं बक्शा, ऐसे घासंलेटी लेखकों ने। “नर के बांटे क्‍या नारी की गगन मूत्रिं ही आई ? ‘लेखिकाएं तो लेखकों से एक कदम और बढ़ गई। प्यार में, श्रृंगार में सम्भोग की क्रियाओं और करतूतों का विस्तृत और नग्न चित्रण बिना करे उनका लेखन अधूरा रह जाता है। लगता है लेखक-लेखिकाएँ बिहारी, देव, पद्माकर को नीचा दिखाने पर तुले हुए हैं, समाज जाए जहन्नुम में |

आज के लेखकों की लेखनी

तीसरी ओर आज का लेखक वातानुकूलित भवन में रहता है। कार और हवाई जहाज को अपनी चरण धूलि से पवित्र करता है। फाइव स्टार होटलों में ठहरता है और नाश्ता करता है। सुरा और सुन्दरी के बिना वह जी नहीं सकता। ऐसा एय्याश और धनादय लेखक जब साम्यवाद की दुंदुभि बजाता है; गरीब, दरिद्र, अर्द्धनग्न, बुभुक्षित, दलित, शोषित, पीड़ित समाज का मसीहा बनकर अपनी लेखनी में उनकी आवाज बुलन्द करता है, तो लगता है दुष्ट-आत्मा वेद के पावन मंत्रों का उच्चारण कर रही है। इस प्रकार का लेखन क्या समाज का कल्याण कर सकेगा ? कारण, लेखक की अभिव्यक्ति में उसकी अपनी अनुभूति ही संपृक्‍त होती है।

वस्तुत: लेखक का सृजन समाज का प्रतिबिम्ब होता है। जिस प्रकार दर्पण व्यक्ति के रूप, रंग तथा स्वास्थ्य का द्योतक है, उसी प्रकार साहित्य जाति के उत्कर्ष-अपकर्ष, सजीवता-निर्जीवता तथा सभ्यता-असभ्यता का निर्णायक तत्त्व है। आज का भारतीय साहित्य चाटुकारिता की मुंह बोलती तस्वीर है, श्रृंगार का श्रृंगारिक दर्पण है और है जीवन और जगत्‌ की झूठ का दस्तावेज। प्रेमचन्द जी ने ठीक ही कहा है–‘ जिन्होंने धन और भोग-विलास को जीवन का लक्ष्य बना लिया है, वह क्‍या लिखेंगा ?’

लेखक के सृजन समाज का प्रतिबिम्ब

लेखक मानव-मस्तिष्क को भोजन प्रदान करता है। जिस प्रकार पौष्टिक भोजन शरीर को स्वस्थ बनाता है, उसी प्रकार श्रेष्ठ लेखक अपनी लेखनी से समाज के कल्याण का मंगलमय पथ- प्रशस्त करता है। वह दहेज के विरुद्ध ‘निर्मला’ लिखता है, शासकों को चेतावनी देते हुए ‘ यक्ष-प्रश्न’ प्रस्तुत करता है, अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के प्रमाणों को ‘गाँधी वध क्‍यों ‘ में उजागर करता है, इतिहास की सच्चाई ‘ देश की हत्या’ और ‘ मेरा रंग दे बसन्ती चोला’ तथा ‘बयं रक्षाम: ‘ ‘ में प्रकट करता है। ऐसे लेखकों की स्याही शहीद के खून से भी ज्यादा पवित्र है।.

दूसरी ओर दूषित साहित्य शरीर को रुग्ण करता है, मानव-मस्तिष्क के विकास को अवरुद्ध करता है। इससे समाज का विकास अवरुद्ध हो जाता है। आज का अधिकांश भारतीय साहित्य इसका प्रमाण है। यही कारण है कि आज राष्ट्र चहूँँ ओर से अपमानित है, उनका रोम-रोम कर्जदार है, वह भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा है, स्वार्थ में मदांध है साम्प्रदायिक विनाश के आगे लिखने का साहस नहीं कर पा रहा। निरपराध हत्याओं के विरुद्ध चेतावनी नहीं दे पा रहा। भारतीय समाज जल रहा है और भारतीय लेखक वंशी के धुन में राग अलाप रहा है।

उपसंहार

लेखक शिव है। समाज-मंथन से उत्पन्न विष को स्वयं पीता है और अमृत समाज को वितरित करता है। लेखक बादल रूप है। समाज की विकृतियों तथा विसंगतियों को वाष्प रूप में ग्रहण करता है और वृष्टि के रूप में लौटा देता है। लेखक +र्थत है। समाज रूपी प्रकृति के प्रकोप सहकर निर्मल जल, उपयोगी तरु और स्वास्थ्यवर्धक वनस्पति उसको समर्पित करता है। समाज जनक है, लेखक उसका पुत्र । समाज कष्ट सहकर भी लेखक को चिन्तन के लिए सामग्री प्रदान करता है । समाज समुद्र है, जिसका हृदय विशाल है, विचारों में गंभीरता है। लेखक उसकी नदी, नदियाँ, सरोवर हैं, जो समाज को विभिन्‍न रूपों में सिंचित करते हैं, सस्य श्यामल करते हैं। अत: समाज लेखक के ब्रिना गूँगा है और
लेखक समाज के बिना निष्प्राण।

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