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वो पहला राष्ट्रपति जो अपना आधा वेतन राष्ट्रीय कोष को दान में देता था, जानिए और भी रोचक बातें

पुराने जमाने की राजनीति और आज की राजनीति में बहुत फर्क देखने को मिलता है. पहले नेताओं का एक ही लक्ष्य होता था कि कैसे देश का विकास किया जाये और जनता की सेवा के लिए वह कैसे सहायता कर सकते हैं लेकिन आजकल तो सत्ता में बैठने की जैसे रेस सी लगी पड़ी है हर कोई चाहता है कि उसकी पार्टी की सरकार बने और वह देश पर राज करे, लेकिन आज हम एक महान शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं.

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यह है वो महान शख्स

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दरअसल, हम जिस शख्स की बात कर रहे हैं वो कोई और नहीं बल्कि देश के पहले राष्ट्रपति हैं डॉ. राजेंद्र प्रसाद हैं. राजेंद्र प्रसाद को 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने पूरी सम्मति से आजाद भारत का पहला राष्ट्रपति बनाया था. लेकिन राष्ट्रपति बनने के एक दिन बाद ही इनकी बहन का निधन हो गया जिसके बाद पूरा देश शोक मग्न हो गया. राजेंद्र प्रसाद पहले ऐसे राष्ट्रपति भी बने थे जिन्हें लगातार दो बार और राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव गया था.

किया ये हैरतअंगेज कारनामा

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जानकारी के लिए आपको बता दें, कि राजेंद्र प्रसाद के कई हैरतअंगेज कारनामों के बारे में चर्चा होती ही रहती है. उस समय वह एक वकील थे और उनकी फ़ीस भी बहुत ज्यादा थी, लेकिन गांधी जी के कहने पर आजादी की लड़ाई में कूदने वाले राजेंद्र प्रसाद ने अंग्रेजों के तौर तरीकों को अपनाने से इंकार कर दिया था. राष्ट्रपति बनने के बाद वह अपने वेतन का आधा हिस्सा राष्ट्रीय कोष में जमा करवा देते थे.

आखिर क्या हुआ उनके परिवार का

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सूत्रों की माने तो राजेंद्र प्रसाद के निधन के बाद उनके परिवार का कोई पता नहीं लग पाया कि आखिर उनका क्या हुआ, वह कहाँ गये. बस ये बताया जा रहा है कि उनके तीन बेटे थे. उनके बड़े बेटे मृत्युंजय प्रसाद ने जयप्रकाश नारायण के अनुरोध करने पर चुनाव लगा था जीत भी हासिल की लेकिन उसके बाद उन्होंने राजनीति को कभी ज्यादा प्राथमिकता नहीं दी थी. बाकि दो बेटे बिहार के छपरा में किसानी जीवन व्यतीत करते थे.

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