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Video: कहानी कविता ठाकुर की जिसनें एशियन गेम्स 2018 में भारत को दिलाया गोल्ड, सुनकर रो देंगे

महज 24 साल की कविता ठाकुर आज किसी पहचान की मोहताज नहीं है. अपनी मेहनत और लगन के बल पर भारतीय महिला कबड्डी टीम में ख़ास  जगह बनाने वाली कविता को यूँ तो आज देश का बच्चा-बच्चा सलाम कर रहा है, लेकिन उनके संघर्षों की दास्तां किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगती.source

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गरीब कविता ने एशियन गेम्स 2018 में फहराया तिरंगा

जी हाँ, एक बेहद गरीब परिवार में पली-बढ़ी कविता को देखकर शायद ही किसी ने सोचा होगा कि वो इस मुकाम तक पहुँच सकती हैं. एशियन गेम्स 2018 में तिरंगा फ़हराने वाली कविता ने वो दौर भी देखा है जब हिमाचल की कंपा देने वाली सर्दियों में भी उनके तन पर न गर्म कपड़ा होता था और न रात में सोने के लिए कंबल. लेकिन हालातों से पार पाते हुए देश की इस बच्ची ने अंततराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय टीम की नुमाइंदगी करते हुए देश का नाम भी रौशन किया.source

जब हालातों ने ढाबे पर काम करने के लिए किया मजबूर 

कविता यूँ तो देश के सबसे सुंदर लेकिन बेहद ठंडे इलाकों में से एक हिमाचल प्रदेश के मनाली की रहने वाली हैं, जहाँ उनका अधिकतर जीवन एक ढाबे पर ही काम करते हुए गुज़रा है. सालों से यह ढाबा उनके पिता पृथ्वी सिंह चलाते आए हैं और माँ कृष्णा देवी चाय बनाने का काम करती रही है. बड़ी बहन कल्पना भी परिवार की आर्थिक तंगी को देखते हुए माँ-बाप का हाथ बंटाया करती थीं.source

बर्तन धोते हुए और जूठन साफ करते हुए बीता बचपन 

जिस उम्र में ज्यादातर लडकियाँ गुड़ियां के साथ खेलती हैं उस खेलने कूदने की उम्र में कविता ढाबे पर बर्तन धोने और जूठन साफ करने को मजबूर थी. इतना ही नहीं कड़कड़ाती सर्दियों में जब इलाके का सारा जनजीवन ठप पड़ जाता था तब ग्राहक न होने के चलते कई बार तो पूरे परिवार को भूखे पेट ही सोना पड़ता था.source

भारतीय महिला कबड्डी टीम ने जीता एशियन गेम्स 2018 में गोल्ड

परिवार के इसी त्याग और राष्ट्रीय स्तर पर लगातार अपना बेहतर प्रदर्शन करके कविता को 2009 में धर्मशाला स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण में जाने का मौका मिला, जिसके बाद मानों फिर कभी कविता ने पलट कर पीछे नहीं देखा. अपनी काबिलियत और हुनर के दम पर उन्होंने पहले नेशनल खेला जल्द ही इंटरनेशनल लेवल पर भी भारतीय महिला कबड्डी टीम को गोल्ड दिलाकर देश का नाम रोशन किया.

वीडियो में देखिये बर्तन धोने से लेकर एशियन गेम्स तक का कविता का सफ़र

निष्कर्ष 

दोस्तों हमारे देश में हुनर की कमी नहीं हैं बस जरुरत हैं उस हुनर को तराशने की ताकि इस देश को और कविता मिल सके जो दुनिया से लड़कर भारत की झोली में गोल्ड डालती रहे.

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